न्यूज़रूम में दलितों और आदिवासियों को अख़बार के सवर्ण समाज से आने वाले मालिकों, मैनेजरों और संपादकों का भरोसा नहीं मिलता; उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि वे ‘अपना आदमी’ नहीं हैं। पढ़ें, अभय कुमार की यह समीक्षा