राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, रानाडे, भंडारकर, आगरकर आदि के कार्य उतना सामाजिक परिवर्तन के लिए वांछित नहीं थे, जितना महात्मा फुले के कार्य। द्विजों का समाज सुधार केवल उनके वर्गों तक ही सीमित था। उनकी परिधि में कभी दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक आ ही नहीं पाएं। पढ़ें, अजय कुमार साव का यह...