हैरानी की बात यह है कि बराबरी का समाज बनाने का ख़्वाब देखने वालों के संघर्षों को जनता के बीच बेअसर करने में जिस तरह सांप्रदायिकता बल्कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का इस्तेमाल किया गया, उसके बरअक्स फुले के इस्लाम या ईसाई धर्मों के प्रति दृष्टि का ज़िक्र कतई नहीं किया जा रहा है।...