औपनिवेशिक भारत में जब स्वामी अछूतानंद ने पांच करोड़ अछूतों की हिंदू धर्म से अलग पहचान का दावा पेश किया तो हिंदी लेखक उनका विरोध करने पर उतारू हो गए। उन्होंने अपनी पत्र-पत्रिकाओं में अछूतानंद ‘हरिहर’ और उनके आदि-हिंदू आंदोलन के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। बता रहे हैं सुरेश कुमार