समकालीन जाति-विरोधी आंदोलन, बहुवाद (अलग-अलग पहचानों के चिह्नीकरण और आरक्षण की व्यवस्था) को बढ़ावा देने की मांग करने में तो आगे हैं, लेकिन वे ‘बहुवादीकरण’ को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। पूरी दुनिया में लोकतंत्र का संकट, दरअसल, बहुवादीकरण का संकट है। बता रहे हैं डॉ. खालिद अनीस अंसारी