ऐसी स्थिति में जब अनुसूचित जातियों के लोग उच्च शिक्षित हो रहे हैं, तरक्की कर रहे हैं, ऊंचे ओहदों पर काबिज हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब जाति की बात आती है तो ऐसे लोग भी हीनभावना से ग्रसित हो जाते हैं। बता रहे हैं डॉ. संजीव खुदशाह
फुले उन्नीसवीं सदी के महानतम व्यक्तियों में से एक थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में तमाम बहसों और विमर्शों की नुमाइंदगी करते हुए ब्राह्मणवादी अवधारणा...