इस पुस्तक का केंद्रीय संदेश यही है कि महात्मा की उपाधि से अधिक महत्वपूर्ण यह देखना है कि वह मनुष्य किसके पक्ष में खड़ा था, किस व्यवस्था को चुनौती दे रहा था और उसकी मुक्ति की कल्पना में सबसे आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति का स्थान कहां था। बता रहे हैं भंवर मेघवंशी