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पश्चिमी राजस्थान में जमींदार और खेतिहर मजदूरों का हाल

अगर जमींदार के घर में चाय बनी है और बटाईदार के पास खुद का बर्तन नहीं है और न ही जमींदार के पास बटाईदार के लिए अलग बर्तन हो तो उसे कई बार चाय से वंचित रहना होता है या फिर उसे आक के पौधे के पत्ते के दोने में चाय पीनी होती है।...

सिरपुर का इतिहास संरक्षित करे सरकार
यूनेस्को ने विश्व धरोहरों की अस्थायी सूची में सिरपुर को शामिल कर महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। लेकिन सिरपुर के इन पुरातात्विक धरोहरों के भ्रमण...
मीडिया नहीं, नागरिक पालिका ही लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
प्रेस को भी जब चौथे स्तंभ के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो उसका महत्व भी उसकी निगरानी के रूप में व्यक्त किया...
बिहार में मजदूरी मांगने पर हिंसा, उठते सवाल
चंदेश्वर चौधरी के परिवार की ओर से लगाए गए आरोपों ने ग्रामीण समाज में पीढ़ियों से चले आ रहे श्रम-संबंधों और शोषण पर भी...
नजीब के बिना दस साल : क्या हुआ ‘जेएनयू के विचार’ और समानता के उसके वादे का?
अगर यह पूछना कि ‘नजीब कहां है?’ शत्रुतापूर्ण हरकत है तो हमें यह पूछना चाहिए कि आखिर हम किस विचार की रक्षा कर रहे...
जंतर-मंतर महज स्थान नहीं, सामूहिक अभिव्यक्ति की आजादी की संस्था है
संसदीय लोकतंत्र में संसद से अभिव्यक्ति के अधिकार की गूंज को दूर करने के प्रयास सत्ता द्वारा निरंतर होते रहे हैं। अभी हाल तक...
पश्चिमी राजस्थान में जमींदार और खेतिहर मजदूरों का हाल
अगर जमींदार के घर में चाय बनी है और बटाईदार के पास खुद का बर्तन नहीं है और न ही जमींदार के पास बटाईदार...
महाड़ बनाम दांडी सत्याग्रह : संदर्भ और हासिल
महाड़ सत्याग्रह का यह सौवां साल है। वर्ष 1927 में डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में पीने के लिए पानी पर हक का सत्याग्रह...
बहुजन विमर्श में महिषासुर से रावण तक
जिस तरह दुर्गा की आराधना करने वालों को अपनी आस्था के प्रदर्शन का अधिकार है, उसी तरह महिषासुर को अपना पूर्वज मानने वाले समुदायों...
एक ऐसी बस्ती में पैदा होना जिसे शरणार्थियों की बस्ती कहा जाता है
1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान विस्थापित हुए सिंधी शरणार्थियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की स्थिति सामाजिक, आर्थिक और कानूनी...
आजीवक दर्शन : जिसकी पहचान भुला दी गई थी (पहला भाग)
लगभग सभी धर्म राजसत्ता से सांठ-गांठ कर, शक्ति-केंद्रों में बदलते चले गए। जैन तथा बौद्ध धर्म ने भी यही किया। आजीवक पिछड़ते गए। सच...
टुकड़े-टुकड़े आईना : दलितों की व्यथा-कथा और प्रतिरोध-प्रतिवाद का जीवंत इतिहास
यदि कोई हिंदी पट्टी का इतिहास सबसे बड़े मेहनतकश हिस्से दलित को केंद्र में रखकर देखना-पढ़ना-लिखना चाहे तो दलित आत्मकथाएं इसका सबसे बड़ा स्रोत...
‘लोकविद्याधर’ : लोककला, श्रम और असमान विकास की विडंबना की कहानी
रामजी यादव की कहानी ‘लोकविद्याधर’ लोककला के क्षरण, पारंपरिक कारीगर जातियों के रोजगार-संकट, बाजार के अमानवीय दबाव और जाति-वर्ग से निर्मित सामाजिक दूरी को...
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की साहित्यिक, भाषायिक व वैचारिक यात्रा
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रकाशित कृतियां भाषा-विज्ञान, साहित्यालोचना, इतिहास-बोध, लोकसंस्कृति तथा बहुजन विमर्श के विविध आयामों को अपने आप में समेटी हुईं हैं।...
‘पीली छतरी वाली लड़की’ की जाति
अगर विश्वविद्यालय में दिखाई देने वाला जातिवाद आसमान से नहीं टपका है, बल्कि यह समाज में मौजूद जातिवाद का ही विस्तार है, तो फिर...
खड़ी बोली की कविता जगत को चुनौती देतीं राजेश पाल की कविताएं
कवि सवाल करता है कि ‘फिर चमारीखेड़ा के नाम में ऐसा क्या चुभ गया, जो लोगों को रास नहीं आता’। तथाकथित ऊंची जाति वालों...
जानिए, सामाजिक परिवर्तन के संवाहक बाबू रामसहाय पासी के बारे में
बाबू रामसहाय चौधरी जब 8 वर्ष के थे, उन्होंने अपनी माता उम्मेदा देवी को मंदिर प्रवेश हेतु सवर्ण समाज द्वारा अपमानित होते देखा-सुना। तभी...
समाजवाद : लोहिया बनाम जगदेव प्रसाद
डॉ. लोहिया, पेरियार ई.वी. रामासामी और जगदेव प्रसाद – तीनों ने ही समाजवाद को भारतीय सामाजिक यथार्थ के अनुसार परिभाषित किया, लेकिन सांस्कृतिक और...
सामाजिक न्याय की राजनीति और जगदेव प्रसाद
जगदेव प्रसाद की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिन्हें व्यापक शोषित समाज की आवाज के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, उन्हें कई बार...
जगदेव प्रसाद ने कहा था– ब्राह्मणवादियों से सटकर नहीं, हटकर लड़ना होगा
जिन मांगों को लेकर 5 सितंबर, 1974 को अरवल जिला के कुर्था प्रखंड कार्यालय के समक्ष शोषित समाज दल के बैनर तले किए जा...
आंबेडकर की नजर में कृष्ण और उनकी गीता
आंबेडकर ने महाभारत और भगवत गीता में कृष्ण की अलग-अलग स्थिति पर चर्चा की है। उन्होंने प्रश्न किया है कि ऐसा क्यों है कि...