मोहन मुक्त सांस्कृतिक वर्चस्व को सत्ता का सबसे चालाक रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि मिथक, परंपरा, धर्म और भाषा के ज़रिए शोषण को पवित्र बना दिया है। उनकी कविताएं ‘संस्कृति’ के उस चेहरे को बेनकाब करती है जो असमानता को नैतिक और स्वाभाविक ठहराती है। बता रहे हैं रुपक कुमार