अगर विश्वविद्यालय में दिखाई देने वाला जातिवाद आसमान से नहीं टपका है, बल्कि यह समाज में मौजूद जातिवाद का ही विस्तार है, तो फिर जाति के प्रश्न को समाज और परिवार तक ले जाने में उपन्यासकार उदय प्रकाश ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली? पढ़ें, अभय कुमार की यह समालोचना