खरगे को यदि संसद में यह बोलने के लिए विवश होना पड़ता है कि उन्हें अछूत समझकर उनके कार्यक्रम स्थल का शुद्धिकरण किया गया तो इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति संवैधानिक व्यवस्था के आगे कोई दूसरी नहीं हो सकती है। पढ़ें, अनिल चमड़िया का यह आलेख
महुआ माजी की यह कथा कोल्हान क्षेत्र (पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, और सरायकेला-खरसावां) के उन आदिवासी समुदायों की वास्तविक परिस्थितियों को सामने लाती है,...
आज अनेक अवसरों पर फुले दंपति के नाम और व्यक्तित्व का सम्मान किया जाता है, लेकिन उनके मनुस्मृति-विरोधी, जाति-विरोधी और ब्राह्मणवादी ज्ञान-सत्ता की आलोचना...