भारत में ईसाईयों की प्रताड़ना भले ही बेरोकटोक जारी हो, लेकिन यहां का व्यापारी वर्ग क्रिसमस के दौरान उत्सवी माहौल का इस्तेमाल अपना धंधा चमकाने के लिए करने में ज़रा भी संकोच नहीं करता है। इस महीने दिल्ली के मॉलों में क्रिसमस कैरोल सुने जा सकते हैं। इनमें से एक कैरोल, जो मेरे दिल को छूता है, वह है– ‘ओ होली नाईट’।
‘ओ होली नाईट’ की रचना मूलतः फ्रेंच भाषा में सन् 1847 में ‘कैनटीक डे नोएल’ शीर्षक से एडॉल्फ एडम ने की थी। इसके (अंग्रेजी अनुवाद) तीसरे अंतरे में मुक्ति की चर्चा है–
सचमुच उसने हमें एक दूसरे से प्रेम करना सिखाया,
प्रेम उसका सिद्धांत है और शांति उसका संदेश,
वह जंजीरों को तोड़ देगा, क्योंकि दास हमारे बंधु हैं,
वह हर प्रकार के दमन को समाप्त करेगा,
हम उसके प्रति कृतज्ञतापूर्वक सानंद उसकी स्तुति कर रहे हैं।
इसका अंग्रेजी संस्करण सन् 1855 में लिखा गया था। तब अमरीकी गृहयुद्ध छह साल दूर था और उसके राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की सभी अफ़्रीकी-अमरीकियों को गुलामी से मुक्त करने की उद्घोषणा होने में आठ साल शेष थे। यह प्रतीत होता है कि ‘ओ होली नाईट’ राजनैतिक प्रतिरोध का गीत था। ज़रा कल्पना करें कि गृहयुद्ध के पहले के कुछ सालों में श्वेत अमरीकी गा रहे हैं– “वह जंजीरों को तोड़ देगा, क्योंकि दास हमारे बंधु हैं; वह हर प्रकार के दमन को समाप्त करेगा”।
मूल फ्रेंच कविता मुक्ति की भावना को और मजबूती से उठाती है। तीसरे अंतरे का शाब्दिक अनुवाद इस प्रकार है–
उस उद्धारक ने सभी बाधाओं को पार कर लिया है,
धरती स्वतंत्र है और स्वर्ग की राह खुल गई है,
वह गुलाम को अपने भाई के रूप में देखता है,
जंजीरों की जगह प्रेम लोगों को एक-दूसरे से जोड़ रहा है,
कौन उसे बताएगा कि हम उसके प्रति कितने कृतज्ञ हैं,
उसने हमारे लिए जन्म लिया, पीड़ा भोगी और मृत्यु को प्राप्त हुआ।
ये अत्यंत ही प्रभावशाली पंक्तियां हैं, विशेषकर दमन के संदर्भ में – फिर चाहे वह अमरीका में अफ्रीकियों का दमन हो या हमारे यहां निचले पायदान पर धकेल दिए गए बहुजनों का।
ईसा मसीह के अनुयायी होने के कारण ही हम फारवर्ड प्रेस को शुरू करने व और उसे चलाते रहने के लिए तमाम कठिनाईयां झेल सके।
कुछ श्वेत अमरीकियों ने उनके देश में अफ्रीकियों की गुलामी के उन्मूलन के लिए इसलिए संघर्ष किया क्योंकि वे ईसा मसीह के प्रतिबद्ध अनुयायी थे। इसी तथ्य को मान्यता देते हुए महात्मा जोतीराव फुले ने सन् 1873 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी’ को “संयुक्त राज्य अमरीका के भले लोगों” को समर्पित किया।
यह अंग्रेज़ सांसद विलियम विल्बरफोर्स के ईसा मसीह के अनुयायी होने और उनके इस विश्वास कि सभी मनुष्य बराबर हैं, का ही परिणाम था कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य में दास प्रथा के उन्मूलन के लिए संघर्ष किया और अंततः उनकी मृत्यु के केवल तीन दिन पहले, 26 जुलाई, 1833 को, दास प्रथा उन्मूलन अधिनियम पारित हुआ।
बाइबिल के लूका अध्याय में ईसा मसीह के बारे में कहा गया है–
फिर वह नासरत आया, जहां वह पला-बढ़ा था और अपनी आदत के अनुसार सब्त के दिन वह यहूदी आराधनालय में गया। जब वह पढ़ने के लिये खड़ा हुआ तो यशायाह नबी की पुस्तक उसे दी गयी। उसने जब पुस्तक खोली तो उसे वह स्थान मिला जहां लिखा था–
“प्रभु का आत्मा मुझमें समाया है
उसने मेरा अभिषेक किया है ताकि मैं दीनों को सुसमाचार सुनाऊं।
उसने मुझे बंदियों को यह घोषित करने के लिए कि वे मुक्त हैं,
अंधों को यह संदेश सुनाने को कि वे फिर दृष्टि पायेंगे,
दमितों को मुक्ति दिलाने को और
प्रभु के अनुग्रह का समय बतलाने को भेजा है।”
फिर उसने पुस्तक बंद करके सेवक को वापस दे दी। और वह नीचे बैठ गया। आराधनालय में सब लोगों की आंखें उसे ही निहार रही थीं। तब वह उनसे कहने लगा, “आज तुम्हें सुनते हुए शास्त्र का यह वचन पूरा हुआ!”
विल्बरफोर्स और अमरीका में गुलामों के मुक्ति के लिए संघर्ष करने वाले किसी का धर्म-परिवर्तन करवाने का प्रयास नहीं कर रहे थे। उन्होंने जो किया वह इसलिए किया, क्योंकि वह उनके डीएनए में था। वे उसकी चेतना के वाहक थे, जो “दमितों को मुक्ति दिलाने” आया था। यह बात उन लोगों के लिए समझना मुश्किल होगी जो ईसा के अनुयायी नहीं हैं। वे यह नहीं समझ सकते कि दुनिया में सब कुछ लेन-देन नहीं होता। हम सब कुछ केवल अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं करते, जब तक कि यह लाभ संपूर्ण मानवता को लाभान्वित करने वाला न हो।
इस क्रिसमस पर मेरी यही कामना है कि यह चेतना भारत के बहुजनों में फैले और वे सामूहिक रूप से दमन से अपनी मुक्ति के लिए काम कर सकें। और यह भी कि ऐसा दिन जल्दी आए जब सब भारतीय एक-दूसरे को अपने भाईयों और बहनों की तरह देखें।
(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)
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